निर्माता-विधु विनोद चोपड़ा
सितारे-आमिर खाऩ,शरमन जोशी,माधवन,करीना कपूर,ओमी...
निर्देशक-राजकुमार हिरानी ने एक बार पुन: भारतीय समाज और व्यवस्था के मूल पर प्रहार किया है।अपनी पूर्व के फिल्मों-लगे रहो मुन्नाभाई, मुन्नाभाई एमबीबीएस, की तरह इस फिल्म में भी उन्होने लोगों को मनोंरंजन करने के साथ-साथ प्रचलित व्यवस्था पर सोचने के लिए मजबूर किया है।चेतन भगत के फाइव प्वाइंट टू सम वन से प्रेरित
फिल्म मूल रूप से वर्तमान भारती
य शिक्षा व्यवस्था के इर्द-गिर्द केन्द्रित है। हंलाकि इसमें कई अत्यंत काल्पनिक दृश्य भी दिखाए गए है।इंजिनियंरिग के छात्रों द्वारा कराए गए ‘कूशलतापू्र्वक’ प्रसव को शायद ही वास्तविक दुनिया में कराया जाना संभव हो
रणछोड़दास चाचड़-रैंचो[आमिर खाऩ],फरहान कुरैशी(माधवन)औऱ राजू रस्तोगी(शरमन जोशी)को एक प्रतिष्ठित इंजिनियरिग कॉलेज आईसीई में मिलता है.कॉलेज के पहले दिन ही डीन वीरू सहस्रबुद्धि-वायरस(बोमेन इरानी)छात्रों से कहता है कि’यदि जीवन में सफल होना है,तो अपने प्रतियोगी को प्रत्येक कदम पर पछाडना होगा।यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की प्रचलित रूपरेखा को स्पष्ट कर देता है।
सामान्य छात्रों से अलग रैंचो कॉलेज के नियमों को नही मानता है और कॉलेज के व्यवस्था पर ही सवाल उठाता है।कॉलेज सबसे बेहतर होते हुए एक भी अविष्कार नही कर पाया है।यह स्पष्ट रूप से भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों पर प्रहार है जो दावे तो बडी़-बड़ी करते है लेकिन नोबेल प्राइज के समय भारतीयों को मन मसोस कर ही रह जाना पडता है।
डीन की बेटी (करीना कपूर) के प्यार में रैंचो के पड़ना,नियम और एसाइन्मेट न करने के बावजूद परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने जैसी बाते शायद ही आम छात्र
कर सकता है।रैंचो अपने दोस्तों को कहता है कि वही काम करो जिसमे तिम्हारी रूची है।
एक्सिलैंस को हासिल करो,सफलता अपने आप मिलेगी।इससे उसके दोस्त और उसके माता -पिता को प्रभावित होते दिखाया गया गया है।यह प्रगतिशील होते गार्जियन को बताता है।
लेकिन फिल्म में चतुर(ओमी) जो कि रैचो का प्रतियोगी था,की नकरात्मक छवी पेश किया गया है।उसके पढ़ने की प्रवृति को किताब से चिपके हुए रूप में दिखाया गया है।
क्या अनुभव मात्र से ही सब कुछ हासिल किया जा सकता है?हमारे जीवन में अन्य लोगों के अनुभव और पुस्तकों का कोई महत्व नही है?यह कुछ अतार्किक सा लगता है।
सभी सीन एक खास क्रम में आते है,जिससे फिल्म दिलचस्प बना रहता है।स्टोरीलाइन,सिनेमैटोग्राफी पर भी पूरा ध्यान दिया गया है।शांतनू मोइत्रा के संगीत भी फिल्म के अनुकूल है।कुल मिलाकर फिल्म बेहतर है।गॉधिगीरी,जादू की छप्पी जैसे शब्दों को प्रचलन में लाने वाले हिरानी को आशा है कि आँल इज वेल ही होगा!
सितारे-आमिर खाऩ,शरमन जोशी,माधवन,करीना कपूर,ओमी...
निर्देशक-राजकुमार हिरानी ने एक बार पुन: भारतीय समाज और व्यवस्था के मूल पर प्रहार किया है।अपनी पूर्व के फिल्मों-लगे रहो मुन्नाभाई, मुन्नाभाई एमबीबीएस, की तरह इस फिल्म में भी उन्होने लोगों को मनोंरंजन करने के साथ-साथ प्रचलित व्यवस्था पर सोचने के लिए मजबूर किया है।चेतन भगत के फाइव प्वाइंट टू सम वन से प्रेरित
फिल्म मूल रूप से वर्तमान भारती
य शिक्षा व्यवस्था के इर्द-गिर्द केन्द्रित है। हंलाकि इसमें कई अत्यंत काल्पनिक दृश्य भी दिखाए गए है।इंजिनियंरिग के छात्रों द्वारा कराए गए ‘कूशलतापू्र्वक’ प्रसव को शायद ही वास्तविक दुनिया में कराया जाना संभव होरणछोड़दास चाचड़-रैंचो[आमिर खाऩ],फरहान कुरैशी(माधवन)औऱ राजू रस्तोगी(शरमन जोशी)को एक प्रतिष्ठित इंजिनियरिग कॉलेज आईसीई में मिलता है.कॉलेज के पहले दिन ही डीन वीरू सहस्रबुद्धि-वायरस(बोमेन इरानी)छात्रों से कहता है कि’यदि जीवन में सफल होना है,तो अपने प्रतियोगी को प्रत्येक कदम पर पछाडना होगा।यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की प्रचलित रूपरेखा को स्पष्ट कर देता है।
सामान्य छात्रों से अलग रैंचो कॉलेज के नियमों को नही मानता है और कॉलेज के व्यवस्था पर ही सवाल उठाता है।कॉलेज सबसे बेहतर होते हुए एक भी अविष्कार नही कर पाया है।यह स्पष्ट रूप से भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों पर प्रहार है जो दावे तो बडी़-बड़ी करते है लेकिन नोबेल प्राइज के समय भारतीयों को मन मसोस कर ही रह जाना पडता है।
डीन की बेटी (करीना कपूर) के प्यार में रैंचो के पड़ना,नियम और एसाइन्मेट न करने के बावजूद परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने जैसी बाते शायद ही आम छात्र
कर सकता है।रैंचो अपने दोस्तों को कहता है कि वही काम करो जिसमे तिम्हारी रूची है।
एक्सिलैंस को हासिल करो,सफलता अपने आप मिलेगी।इससे उसके दोस्त और उसके माता -पिता को प्रभावित होते दिखाया गया गया है।यह प्रगतिशील होते गार्जियन को बताता है।
लेकिन फिल्म में चतुर(ओमी) जो कि रैचो का प्रतियोगी था,की नकरात्मक छवी पेश किया गया है।उसके पढ़ने की प्रवृति को किताब से चिपके हुए रूप में दिखाया गया है।
क्या अनुभव मात्र से ही सब कुछ हासिल किया जा सकता है?हमारे जीवन में अन्य लोगों के अनुभव और पुस्तकों का कोई महत्व नही है?यह कुछ अतार्किक सा लगता है।
सभी सीन एक खास क्रम में आते है,जिससे फिल्म दिलचस्प बना रहता है।स्टोरीलाइन,सिनेमैटोग्राफी पर भी पूरा ध्यान दिया गया है।शांतनू मोइत्रा के संगीत भी फिल्म के अनुकूल है।कुल मिलाकर फिल्म बेहतर है।गॉधिगीरी,जादू की छप्पी जैसे शब्दों को प्रचलन में लाने वाले हिरानी को आशा है कि आँल इज वेल ही होगा!
हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
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कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
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इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये