उत्पादन में कमी आते ही जीडीपी वृद्धि पर लगाम लगने लगता है। स्वतंत्रता मिलने के तुरन्त बाद जबकी उधोगों,सेवा क्षेत्र बहुत कम विकसित था,कृषि की महत्ता को स्वीकार किया गया। यही वजह है कि प्रथम पंचवर्षीय योजना में खेती को प्राथमिकता दी गयी।सिंचाई साधनों,तकनिकों के उपयोग को बढ़ावा से खेती का फैलाव और अधिक क्षेत्रों में हुआ। सिचाई के लिए बड़े-बड़े बांधों को बनाया गया। इन्हें ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ भी कहा गया।लेकिन ये ‘मंदिर’ भारी संख्या में लोगों के विस्थापन की वजह बने।इससे सबक लिए बिना आज भी बड़े-बड़े बांध पश्चिमी देशों की नकल पर बनाये जा रहे हैं।आगे की पंचवर्षीय योजनाओं में भी खेती पर ध्यान दिया दिया गया। हंलाकि दूसरी पंचवर्षीय योजना से उधोगों के विकास को प्राथमिक दिया गया। काश्त भूमि में बढ़ोतरी के बावजूद परंपरागत तकनिक,बीज के उपयोग और निम्न उत्पादन की वजह से भारत एक खाद्यान आयातक देश ही बना रहा। गेंहू के आयात के लिए भरत को पीएल 480 समझौता करना पड़ा। शीतयुद्ध की परिस्थिति में यह समझौता अमेरिका के दया पर निर्भर था । दिन प्रतिदिन खाद्यान की बढ़ती मांग को पूरा करने और आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए नई तकनिकों ,संकरित बीज,कीटनाशक के प्रयोग को बढा़वा दिया गया ।इसके फलस्वरूप भारत में हरित क्रांति आयी और गेहूं,धान के उत्पादन में वृद्धि हुई।1970-71 में खाद्यान उत्पादन बढ़कर 1080 लाख टन हो गया जो कि 1960-61 की तुलना में 260 लाख टन अधिक था। आगे भी उत्पादन में बढ़ोतरी जारी रहा। 2007-08 में 22 करोड़ 70 लाख टन हो गया।लेकिन हरित क्रांति टिकाउ उत्पादन का साधन नहीं बन पाया।खाद्यान उत्पादन में एक प्रकार से स्थिरता आ गयी हैं। हरित क्रांति वाले हरियाणा,पंजाब जैसे प्रदेशों का एक बडा़ भूभाग आज खेती के लायक नहीं है। पानी,रसायनिक उर्वरक और पीड़कनाशी के अधिक प्रयोग से मिट्टी पर बुरा प्रभाव पड़ा है।रसायनों के वजह से कैसर जैसी खतरनाक बीमारी का प्रकोप भी बढ़ रहा है।
भारत में हरित क्रांति की सबसे बड़ी सीमा रही कि यह खास राज्यों और बड़े किसानों तक ही सिमित रहा।इससे समाज के पहले से ही शक्तिशाली वर्ग का हित साधन हुआ। आज भी कृषि से जनसंख्या एक बड़ा हिस्सा जुड़ा हुआ है। खेती उनके लिए जीवन-मरण का सवाल है। लेकिन सरकार के कृषि की तरफ उपेक्षापूर्ण रवैया या फिर इच्छाशक्ति के अभाव की वजह से हरेक साल हजारों की संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं।1997 से लेकर आज तक करीब दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके है । आज उदारिकरण की दुहायी देकर किसानों के हितों की अनदेखी की जा रही है। खेती और किसानी के लिए जरूरी पानी,बीज,खाद जैसी चीजों से जुड़ी नीतियां कारपोरेटरों के पक्ष में है। किसानों के उत्पाद का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है। किसान अभी भी बिचौलियों को अपना समान बेचने के लिए मजबूर है। कई राज्यों ने मंडी ब्यवस्था से किनारा कर लिया है। सरकार की एकतरफा आर्थिक नीतियों की वजह सेही नकस्लवाद की प्रसार में तेजी आयी है। योजना आयोग का कहना है कि देश में 300 जिले ऐसे है जहाँ किसी न किसी रूप में आतंक का राज्य कायम है। जाहिर है यह स्थिति बदलनी होगी। सरकार को खेती को टिकाउ और इकनॉमिक बनाना होगा।आध्र प्रदेश में चल रहे कम्युनिटी मैनेज्ड सस्टनेबल एग्रीकल्चर मॉडल को देश के अन्य भागों में फैलाकर खेती को टिकाउ बनाया जा सकता है।इससे न केवल किसानों की स्थिति सुधरेगी बल्कि शहरी गरीबों को भी महंगाई की मार से बचाया जा सकेगा। तभी सही रूप में भारतीय गणतंत्र विश्व के लिए मॉडल बन पाएगा और आम आदमी भी गणतंत्र पर्व को मनाएगा।
No comments:
Post a Comment