बीता हुआ वर्ष 2009 शिक्षा औऱ शैक्षिक ढांचे को लेकर चर्चित रहा।चाहे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के शैक्षणिक सुधार संबधि छोड़े गए सिगुफे हो या फिर यशपाल समिति की सिफारिशे।इन सबने मीडिया में खूब सुर्खिया बटोरी।शिक्षा का अधिकार कानून ने भी पर्याप्त स्थान प्राप्त किया।
दरअसल ये तमाम कसरत समावेशी विकास के प्रक्रिया को तीव्र बनाने के मध्यनजर किए जा रहे है।11वीं पंचवर्षीय योजना(2007-12)के मुख्य लक्ष्य समावेशी विकास को हासिल करने में शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण योगदान शायद ही किसी और का हो सकता है।उत्तम और समग्र शिक्षा न केवल लोगों को सशक्त बनाती,बल्कि व्यक्तिगत और सामूहिक हकों को प्राप्त करने के लिए भी प्रोत्साहित करती है। फिर शिक्षा सहस्त्राबदी विकास लक्ष्य का भी एक महत्वपूर्ण घटक है।
शिक्षा व्यवस्था के वर्तमान संगठनात्मक ढांचे पर सबसे अधिक चर्चा हुई। सिब्बल ने विभिन्न राज्यों के माध्यमिक शिक्षा बोर्डों की जगह एक अखिल भारतीय स्तर के बोर्ड बनाने की बात कही।उनका तर्क है, कि इससे विभिन्न छात्रों के बीच विषमता और पाठयक्रम संबंधि जटिलता को कम करने में मदद मिलेगी।लेकिन इस योजना को अनेक राज्य सरकारों ने सिरे से खारिज कर दिया। राज्यों ने इसे भारतीय विवधता में एकता के विरूद्ध बताया । इस पर अभी भी बहस जारी है।
उच्च शिक्षा के पुनर्गठन औऱ पुर्नद्धार पर परामर्श देने के लिए गठित यशपाल समिति के सिफारिशों पर भी चर्चाएं हुई। समिति ने उच्च शिक्षा और शोध को विनियमित करने वाले विभिन्न स्वायत्त संस्थाओं, आयोगों,बोर्डों(एआइसीटीइ,यूजीसी...) की जगह एक ही अधिकार संपन्न स्वायत्त प्राधिकरण के गठन की सिफारिश की। समिति ने उच्च शिक्षा से संबंद्ध विभिन्न संस्थाओं को वर्तमान आवश्यकता के लिए अपर्याप्त बताया। समिति के अनुसार विनियमित करने वाले विभिन्न उच्च शिक्षा परिषदों से उच्च शिक्षा अनेक क्यूबों में बंट गयी है जिसकी वजह से इसके विकास में बाधा आ रही है।
लेकिन प्रस्तावित प्राधिकरण के वित्तीय स्वायत्ता पर विद्वानों ने सवाल उठाये। समिति ने बजट से ही प्राधिकरण को वित्त देने की सिफारिश की है। इससे कैबिनेट औऱ राजनीतिक हस्तक्षेप, गोलमाल को जगह मिलता है।जेएनयू से राजनीतिशास्त्र में पीएचडी कर रहे नरेश के अनुसार प्रस्तावित प्राधिकरण को भारत के संचित निधि से
वित्त दिए जाने की ब्यवस्था करने पर ही कुछ बात बनेगी। उच्च शिक्षा में सुधार के लिए अन्य कदम उठाए जाने को भी मंत्रालय के शुरूआती सौ दिन के एजेंडे में स्थान दिया गया। उच्च शिक्षा में अनिवार्य मूल्यांकन औऱ मान्यता के लिए स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण का गठन, विदेशी शिक्षा प्रदाताओं के नियमन के लिए नया कानून बनाना जैसे अनेक प्रावधान एजेडे में शामिल है। डीम्ड विश्वविद्यालयों की कार्य प्रणाली की समीक्षा करने, नये केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना, पालिटेक्निक संस्थाओं की स्थापना जैसे मुद्दे भी चर्चा में रहे।
2002 से ही चर्चा में रहा शिक्षा का अधिकार विधेयक को कानून के रूप में परिवर्तित कर सरकार अपना पीठ ठोक रही है। इस कानून के माध्यम से छह वर्ष से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करना बुनियादी अधिकार बना दिया गया है। मुफ्त औऱ अनिवार्य रूप से शिक्षा उपलब्ध कराने का जिम्मा सरकार को दिया गया है। निजी स्कूलों में गरीबों और वंचितों के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटों का आरक्षण औऱ बच्चों को हर साल की परीक्षाओं से मुक्ति जैसे प्रावधानों को क्रांतिकारी माना जा रहा है। लेकिन अनेक लोगों ने कानून के अनेक प्रावधानों पर सवाल उठाया है।
केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के ग्रेडिंग सिस्टम इस वर्ष से शुरू करने के निर्णय को भी सराहा जा रहा है।इससे न केवल छात्रों को परीक्षा के तनाव से मुक्ति मिलेगी बल्कि परीक्षा संबंधी डर से भी बच्चों को निजात मिलने की संभावना है। इससे बच्चों में सृजानत्मकता को भी बढ़ावा मिलने की आशा है। इस साल बोर्ड परीक्षा में शामिल होने जा रहे दिल्ली पब्लिक स्कूल के छात्र प्रणव ने बताया कि ग्रेडिंग सिस्टम लागू होने से परीक्षा से कम डर लग रहा है और तैयारी भी बेहतर ढंग से कर पा रहा हूं।
शिक्षा के महत्व औऱ प्रभाव को समझते हुए नये सिरे से परिभाषित करने की कोशिश एक अच्छी शुरूआत है।लेकिन तमाम चुनौतियों से जुझते हुए वास्तविक रूप में प्रस्तावों को जमीन पर उतारने से ही शैक्षणिक ढांचा का ऑल इज वेल होगा।
Friday, January 8, 2010
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