Wednesday, March 17, 2010

बीते साठ सालों में खेती और किसानी

खेती आज भी भारतीय अर्थब्यवस्था की रीढ़ है। खेती के उत्पादन में कमी आते ही जीडीपी वृद्धि पर लगाम लगने लगता है। स्वतंत्रता मिलने के तुरन्त बाद जबकी उधोगों,सेवा क्षेत्र बहुत कम विकसित था,कृषि की महत्ता को स्वीकार किया गया। यही वजह है कि प्रथम पंचवर्षीय योजना में खेती को प्राथमिकता दी गयी।सिंचाई साधनों,तकनिकों के उपयोग को बढ़ावा से खेती का फैलाव और अधिक क्षेत्रों में हुआ। सिचाई के लिए बड़े-बड़े बांधों को बनाया गया। इन्हें ‘आधुनिक भारत के मंदिर’ भी कहा गया।लेकिन ये ‘मंदिर’ भारी संख्या में लोगों के विस्थापन की वजह बने।
इससे सबक लिए बिना आज भी बड़े-बड़े बांध पश्चिमी देशों की नकल पर बनाये जा रहे हैं।आगे की पंचवर्षीय योजनाओं में भी खेती पर ध्यान दिया दिया गया। हंलाकि दूसरी पंचवर्षीय योजना से उधोगों के विकास को प्राथमिक दिया गया। काश्त भूमि में बढ़ोतरी के बावजूद परंपरागत तकनिक,बीज के उपयोग और निम्न उत्पादन की वजह से भारत एक खाद्यान आयातक देश ही बना रहा। गेंहू के आयात के लिए भरत को पीएल 480 समझौता करना पड़ा। शीतयुद्ध की परिस्थिति में यह समझौता अमेरिका के दया पर निर्भर था । दिन प्रतिदिन खाद्यान की बढ़ती मांग को पूरा करने और आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए नई तकनिकों ,संकरित बीज,कीटनाशक के प्रयोग को बढा़वा दिया गया ।इसके फलस्वरूप भारत में हरित क्रांति आयी और गेहूं,धान के उत्पादन में वृद्धि हुई।1970-71 में खाद्यान उत्पादन बढ़कर 1080 लाख टन हो गया जो कि 1960-61 की तुलना में 260 लाख टन अधिक था। आगे भी उत्पादन में बढ़ोतरी जारी रहा। 2007-08 में 22 करोड़ 70 लाख टन हो गया।लेकिन हरित क्रांति टिकाउ उत्पादन का साधन नहीं बन पाया।खाद्यान उत्पादन में एक प्रकार से स्थिरता आ गयी हैं। हरित क्रांति वाले हरियाणा,पंजाब जैसे प्रदेशों का एक बडा़ भूभाग आज खेती के लायक नहीं है। पानी,रसायनिक उर्वरक और पीड़कनाशी के अधिक प्रयोग से मिट्टी पर बुरा प्रभाव पड़ा है।रसायनों के वजह से कैसर जैसी खतरनाक बीमारी का प्रकोप भी बढ़ रहा है।
भारत में हरित क्रांति की सबसे बड़ी सीमा रही कि यह खास राज्यों और बड़े किसानों तक ही सिमित रहा।इससे समाज के पहले से ही शक्तिशाली वर्ग का हित साधन हुआ। आज भी कृषि से जनसंख्या एक बड़ा हिस्सा जुड़ा हुआ है। खेती उनके लिए जीवन-मरण का सवाल है। लेकिन सरकार के कृषि की तरफ उपेक्षापूर्ण रवैया या फिर इच्छाशक्ति के अभाव की वजह से हरेक साल हजारों की संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं।1997 से लेकर आज तक करीब दो लाख किसान आत्महत्या कर चुके है । आज उदारिकरण की दुहायी देकर किसानों के हितों की अनदेखी की जा रही है। खेती और किसानी के लिए जरूरी पानी,बीज,खाद जैसी चीजों से जुड़ी नीतियां कारपोरेटरों के पक्ष में है। किसानों के उत्पाद का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा है। किसान अभी भी बिचौलियों को अपना समान बेचने के लिए मजबूर है। कई राज्यों ने मंडी ब्यवस्था से किनारा कर लिया है। सरकार की एकतरफा आर्थिक नीतियों की वजह सेही नकस्लवाद की प्रसार में तेजी आयी है। योजना आयोग का कहना है कि देश में 300 जिले ऐसे है जहाँ किसी न किसी रूप में आतंक का राज्य कायम है। जाहिर है यह स्थिति बदलनी होगी। सरकार को खेती को टिकाउ और इकनॉमिक बनाना होगा।आध्र प्रदेश में चल रहे कम्युनिटी मैनेज्ड सस्टनेबल एग्रीकल्चर मॉडल को देश के अन्य भागों में फैलाकर खेती को टिकाउ बनाया जा सकता है।इससे न केवल किसानों की स्थिति सुधरेगी बल्कि शहरी गरीबों को भी महंगाई की मार से बचाया जा सकेगा। तभी सही रूप में भारतीय गणतंत्र विश्व के लिए मॉडल बन पाएगा और आम आदमी भी गणतंत्र पर्व को मनाएगा।

Friday, January 8, 2010

थ्री इडियट्स यानी आँल इज वेल

निर्माता-विधु विनोद चोपड़ा
सितारे-आमिर खाऩ,शरमन जोशी,माधवन,करीना कपूर,ओमी...
निर्देशक-राजकुमार हिरानी ने एक बार पुन: भारतीय समाज और व्यवस्था के मूल पर प्रहार किया है।अपनी पूर्व के फिल्मों-लगे रहो मुन्नाभाई, मुन्नाभाई एमबीबीएस, की तरह इस फिल्म में भी उन्होने लोगों को मनोंरंजन करने के साथ-साथ प्रचलित व्यवस्था पर सोचने के लिए मजबूर किया है।चेतन भगत के फाइव प्वाइंट टू सम वन से प्रेरित
फिल्म मूल रूप से वर्तमान भारती शिक्षा व्यवस्था के इर्द-गिर्द केन्द्रित है। हंलाकि इसमें कई अत्यंत काल्पनिक दृश्य भी दिखाए गए है।इंजिनियंरिग के छात्रों द्वारा कराए गए ‘कूशलतापू्र्वक’ प्रसव को शायद ही वास्तविक दुनिया में कराया जाना संभव हो
रणछोड़दास चाचड़-रैंचो[आमिर खाऩ],फरहान कुरैशी(माधवन)औऱ राजू रस्तोगी(शरमन जोशी)को एक प्रतिष्ठित इंजिनियरिग कॉलेज आईसीई में मिलता है.कॉलेज के पहले दिन ही डीन वीरू सहस्रबुद्धि-वायरस(बोमेन इरानी)छात्रों से कहता है कि’यदि जीवन में सफल होना है,तो अपने प्रतियोगी को प्रत्येक कदम पर पछाडना होगा।यह हमारी शिक्षा व्यवस्था की प्रचलित रूपरेखा को स्पष्ट कर देता है।
सामान्य छात्रों से अलग रैंचो कॉलेज के नियमों को नही मानता है और कॉलेज के व्यवस्था पर ही सवाल उठाता है।कॉलेज सबसे बेहतर होते हुए एक भी अविष्कार नही कर पाया है।यह स्पष्ट रूप से भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों पर प्रहार है जो दावे तो बडी़-बड़ी करते है लेकिन नोबेल प्राइज के समय भारतीयों को मन मसोस कर ही रह जाना पडता है।
डीन की बेटी (करीना कपूर) के प्यार में रैंचो के पड़ना,नियम और एसाइन्मेट न करने के बावजूद परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने जैसी बाते शायद ही आम छात्र
कर सकता है।रैंचो अपने दोस्तों को कहता है कि वही काम करो जिसमे तिम्हारी रूची है।
एक्सिलैंस को हासिल करो,सफलता अपने आप मिलेगी।इससे उसके दोस्त और उसके माता -पिता को प्रभावित होते दिखाया गया गया है।यह प्रगतिशील होते गार्जियन को बताता है।
लेकिन फिल्म में चतुर(ओमी) जो कि रैचो का प्रतियोगी था,की नकरात्मक छवी पेश किया गया है।उसके पढ़ने की प्रवृति को किताब से चिपके हुए रूप में दिखाया गया है।
क्या अनुभव मात्र से ही सब कुछ हासिल किया जा सकता है?हमारे जीवन में अन्य लोगों के अनुभव और पुस्तकों का कोई महत्व नही है?यह कुछ अतार्किक सा लगता है।
सभी सीन एक खास क्रम में आते है,जिससे फिल्म दिलचस्प बना रहता है।स्टोरीलाइन,सिनेमैटोग्राफी पर भी पूरा ध्यान दिया गया है।शांतनू मोइत्रा के संगीत भी फिल्म के अनुकूल है।कुल मिलाकर फिल्म बेहतर है।गॉधिगीरी,जादू की छप्पी जैसे शब्दों को प्रचलन में लाने वाले हिरानी को आशा है कि आँल इज वेल ही होगा!

नए साल में अर्थजगत्

इस साल आर्थिक मंदी के पूरी तरह खत्म होने की संभावना जतीयी जा रही
है।आर्थिक वृद्धि के मोर्चें पर पर बेहतर और सशक्त प्रदर्शन तथा सरकारी
कंपनियों में विनिवेंश की आशा है।फिर रोजगार के अवसरों,बैंकिग सेक्टर और
आंटोमोबाइल सेक्टर में भी तेजी आ रही है,जो स्पष्ट रूप से अर्थव्यवस्था
की बेहतर होती स्थिति की ओर संकेत कर रहा है।इन तमाम सकारात्मक संकेतो से
तेजड़िया को बल मिलेगा औऱ सेंसेक्स 21 हजार को पर कर सकता है।हंलाकि
महंगाई की वजह से ब्याज दरों के बढ़ने की संभावना,कृषि के आभी भी संकट
में होने और राजस्व घाटा की चिन्ता जैसे मुद्दों से सेंसेक्स की चाल पर
कुछ सीमा तक लगाम लग सकता है। प्रोत्साहन पैकजों की वजह से वित्तीय घाटा सघउ(सकल घरेलू उत्पाद) के 7 फीसदी के लगभग पहुंच चुका है।यह सरकार और नीति निर्धारकों के लिए चिन्ता का सबब बना हुआ है।उन्हें यह निश्चित करना मुश्किल हो रहा है कि कब और कैसे पैकेज को वापस लिए जाए।यदि एकाएक इसे वापस लिया जाता है तो इसका विपरीत प्रभाव तथाकथित ग्रोथ और फिर शेयर बाजार पर पड़ना लाजिमि है।यही वजह है कि जनवरी के दूसरे सप्ताह में बजट पूर्व वित्त मंत्री के साथ चर्चा में उधोगपत्तियों ने औधोगिक वृद्धि की दुहाई देकर पैकज को कुछ और समय तक जारी रखने का आग्रह किया।
कृषि की दशा जस की तस बनी हुई है।महंगाई भी दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है।कृषि मंत्री शरद पवार का बयान कि रबी फसल के बाद ही महंगाई में कुछ कमी आएगी,ने बढंती कीमतों को और हवा दे दी।कृषि क्षेत्र के लिए ठोस कदम उठाने होगे।कृषि विशेषज्ञ देविन्दर शर्मा के अनुसार आज जरूरत किसानों को कर्ज देने की नहीं बल्कि उनकी आमदनी बढ़ाने की है।
सरकार को इसपर अमल करना चाहिए। तभी अवारा पैसों(संस्थागत विदेशी निवेश) की जगह स्वस्थ महौल में उपर चढ़ा सेंसेक्स,निफ्टी एक सीमा तक स्थायी होगा।साथ ही अधिक लोगों तक अपनी पहुंच बनाने में कामयाब होगी।
सेंसेक्स के 21 हजार तक या उसके पार जाने की संभावना तो दिखती है परन्तु वर्तमान महौल में कब तक उस स्तर पर बना रहेगा।यह तो आने वाले समय में ही पत्ता चल पाएग। फिर भी 2009 की तुलना में यह साल बहतर ही रहने की संभावना है।

शेय़र बाजार में अन्य सुधार भी जरुरी

चार जनवरी से शेयर बाजार नौ बजे से ही खुलने लगा है। इससे निवेशकों को लाभ मिलने की उम्मीद है,उन्हें कारोबार करने के लिए ज्यदा समय मिलेगा। विशेषकर खुदरा निवेशकों जो कि अधिकाशत: निजी या सरकारी कंपनियों में काम करते है,को सुबह निवेश करने का समय मिल पाएगा।इससे न केवल कारोबार बढ़ेगा बल्कि बाजार का आधार भी बढ़ेगा।
प्रतिस्पर्धा के इस युग में अन्य देशों विशेषकर पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से और भी अधिक निवेश आकर्षित करने में सहायता मिलेगी।इससे भारत पारदर्शिता को बढ़ावा देते हुए वत्तीय क्षेत्र में अग्रणी बनकर उभरेगा।लेकिन मात्र बाजार का समय बढाने भर से ही कारोबार में बढो़तरी नहीं हो जाएगा।
शेयर बाजार की पहुच सभी तक हो सके इसके लिए अनेक सरचनात्मक सुधार करने की जरूरत है।सबसे पहले आम जनता मे शेयर बाजार के संदर्भ में जागरूकता फैलाया जाए।अभी तक भारत की कुल जनसंख्या के केवल एक से ढेढ़ फीसदी लोग ही शेयर बाजार से संबद्ध है। शेयर बाजार से परोक्ष-अपरोक्ष रूप से संबंधित क्षेत्रों ,संस्थाओं से बेहतर ताल-मेल होना भी जरूरी है।अगर बैक दस बजे खुलते है,तो मार्जिन फंड की ब्यवस्था करना मुश्किल होगा।काररोबारी अवधि बढ़ने से शेयर बाजार में काम करने वाले कर्मचारियों,ब्रोंकरों पर दबाव वढेगा।इसे लेकर ब्रोकरों ने तो विरोध करना भी शुरू कर दिया है।इन तमाम समस्याओं को व्यापक रूप में देखे और समझे जाने की आवश्यकता है।वास्तविक रूप में कारोबार बढ़ाना है और शेयर बाजार की पहुच आम जनता तक करना है,तो इन समस्याओं का समाधान करना जरूरी होगा।

बीते हुए साल के आइने में शिक्षा

बीता हुआ वर्ष 2009 शिक्षा औऱ शैक्षिक ढांचे को लेकर चर्चित रहा।चाहे मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के शैक्षणिक सुधार संबधि छोड़े गए सिगुफे हो या फिर यशपाल समिति की सिफारिशे।इन सबने मीडिया में खूब सुर्खिया बटोरी।शिक्षा का अधिकार कानून ने भी पर्याप्त स्थान प्राप्त किया।
दरअसल ये तमाम कसरत समावेशी विकास के प्रक्रिया को तीव्र बनाने के मध्यनजर किए जा रहे है।11वीं पंचवर्षीय योजना(2007-12)के मुख्य लक्ष्य समावेशी विकास को हासिल करने में शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण योगदान शायद ही किसी और का हो सकता है।उत्तम और समग्र शिक्षा न केवल लोगों को सशक्त बनाती,बल्कि व्यक्तिगत और सामूहिक हकों को प्राप्त करने के लिए भी प्रोत्साहित करती है। फिर शिक्षा सहस्त्राबदी विकास लक्ष्य का भी एक महत्वपूर्ण घटक है।
शिक्षा व्यवस्था के वर्तमान संगठनात्मक ढांचे पर सबसे अधिक चर्चा हुई। सिब्बल ने विभिन्न राज्यों के माध्यमिक शिक्षा बोर्डों की जगह एक अखिल भारतीय स्तर के बोर्ड बनाने की बात कही।उनका तर्क है, कि इससे विभिन्न छात्रों के बीच विषमता और पाठयक्रम संबंधि जटिलता को कम करने में मदद मिलेगी।लेकिन इस योजना को अनेक राज्य सरकारों ने सिरे से खारिज कर दिया। राज्यों ने इसे भारतीय विवधता में एकता के विरूद्ध बताया । इस पर अभी भी बहस जारी है।
उच्च शिक्षा के पुनर्गठन औऱ पुर्नद्धार पर परामर्श देने के लिए गठित यशपाल समिति के सिफारिशों पर भी चर्चाएं हुई। समिति ने उच्च शिक्षा और शोध को विनियमित करने वाले विभिन्न स्वायत्त संस्थाओं, आयोगों,बोर्डों(एआइसीटीइ,यूजीसी...) की जगह एक ही अधिकार संपन्न स्वायत्त प्राधिकरण के गठन की सिफारिश की। समिति ने उच्च शिक्षा से संबंद्ध विभिन्न संस्थाओं को वर्तमान आवश्यकता के लिए अपर्याप्त बताया। समिति के अनुसार विनियमित करने वाले विभिन्न उच्च शिक्षा परिषदों से उच्च शिक्षा अनेक क्यूबों में बंट गयी है जिसकी वजह से इसके विकास में बाधा आ रही है।
लेकिन प्रस्तावित प्राधिकरण के वित्तीय स्वायत्ता पर विद्वानों ने सवाल उठाये। समिति ने बजट से ही प्राधिकरण को वित्त देने की सिफारिश की है। इससे कैबिनेट औऱ राजनीतिक हस्तक्षेप, गोलमाल को जगह मिलता है।जेएनयू से राजनीतिशास्त्र में पीएचडी कर रहे नरेश के अनुसार प्रस्तावित प्राधिकरण को भारत के संचित निधि से
वित्त दिए जाने की ब्यवस्था करने पर ही कुछ बात बनेगी। उच्च शिक्षा में सुधार के लिए अन्य कदम उठाए जाने को भी मंत्रालय के शुरूआती सौ दिन के एजेंडे में स्थान दिया गया। उच्च शिक्षा में अनिवार्य मूल्यांकन औऱ मान्यता के लिए स्वतंत्र नियामक प्राधिकरण का गठन, विदेशी शिक्षा प्रदाताओं के नियमन के लिए नया कानून बनाना जैसे अनेक प्रावधान एजेडे में शामिल है। डीम्ड विश्वविद्यालयों की कार्य प्रणाली की समीक्षा करने, नये केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना, पालिटेक्निक संस्थाओं की स्थापना जैसे मुद्दे भी चर्चा में रहे।
2002 से ही चर्चा में रहा शिक्षा का अधिकार विधेयक को कानून के रूप में परिवर्तित कर सरकार अपना पीठ ठोक रही है। इस कानून के माध्यम से छह वर्ष से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करना बुनियादी अधिकार बना दिया गया है। मुफ्त औऱ अनिवार्य रूप से शिक्षा उपलब्ध कराने का जिम्मा सरकार को दिया गया है। निजी स्कूलों में गरीबों और वंचितों के बच्चों के लिए 25 फीसदी सीटों का आरक्षण औऱ बच्चों को हर साल की परीक्षाओं से मुक्ति जैसे प्रावधानों को क्रांतिकारी माना जा रहा है। लेकिन अनेक लोगों ने कानून के अनेक प्रावधानों पर सवाल उठाया है।
केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के ग्रेडिंग सिस्टम इस वर्ष से शुरू करने के निर्णय को भी सराहा जा रहा है।इससे न केवल छात्रों को परीक्षा के तनाव से मुक्ति मिलेगी बल्कि परीक्षा संबंधी डर से भी बच्चों को निजात मिलने की संभावना है। इससे बच्चों में सृजानत्मकता को भी बढ़ावा मिलने की आशा है। इस साल बोर्ड परीक्षा में शामिल होने जा रहे दिल्ली पब्लिक स्कूल के छात्र प्रणव ने बताया कि ग्रेडिंग सिस्टम लागू होने से परीक्षा से कम डर लग रहा है और तैयारी भी बेहतर ढंग से कर पा रहा हूं।
शिक्षा के महत्व औऱ प्रभाव को समझते हुए नये सिरे से परिभाषित करने की कोशिश एक अच्छी शुरूआत है।लेकिन तमाम चुनौतियों से जुझते हुए वास्तविक रूप में प्रस्तावों को जमीन पर उतारने से ही शैक्षणिक ढांचा का ऑल इज वेल होगा।

Thursday, November 26, 2009

भारतीय प्रधानमंत्री के अमेरिका यात्रा के मायने
भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ,अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के पहले राजकीय अतिथि के रुप में वाशिगटन पहुचे। यात्रा से भारत की कुछ उम्मीदे थी।आशा किया जा रहा था कि आतंकवाद,परमाणु पुर्नसंस्करण,जलवायु परिवर्तन जैसे तमाम मुद्दों पर कुछ ठोस नतीजे सामने आएगे।
लेकिन इस यात्रा से कुछ अंतिम रूप से आता दिखाई नहीं पड़ रहा है।