Friday, January 8, 2010

नए साल में अर्थजगत्

इस साल आर्थिक मंदी के पूरी तरह खत्म होने की संभावना जतीयी जा रही
है।आर्थिक वृद्धि के मोर्चें पर पर बेहतर और सशक्त प्रदर्शन तथा सरकारी
कंपनियों में विनिवेंश की आशा है।फिर रोजगार के अवसरों,बैंकिग सेक्टर और
आंटोमोबाइल सेक्टर में भी तेजी आ रही है,जो स्पष्ट रूप से अर्थव्यवस्था
की बेहतर होती स्थिति की ओर संकेत कर रहा है।इन तमाम सकारात्मक संकेतो से
तेजड़िया को बल मिलेगा औऱ सेंसेक्स 21 हजार को पर कर सकता है।हंलाकि
महंगाई की वजह से ब्याज दरों के बढ़ने की संभावना,कृषि के आभी भी संकट
में होने और राजस्व घाटा की चिन्ता जैसे मुद्दों से सेंसेक्स की चाल पर
कुछ सीमा तक लगाम लग सकता है। प्रोत्साहन पैकजों की वजह से वित्तीय घाटा सघउ(सकल घरेलू उत्पाद) के 7 फीसदी के लगभग पहुंच चुका है।यह सरकार और नीति निर्धारकों के लिए चिन्ता का सबब बना हुआ है।उन्हें यह निश्चित करना मुश्किल हो रहा है कि कब और कैसे पैकेज को वापस लिए जाए।यदि एकाएक इसे वापस लिया जाता है तो इसका विपरीत प्रभाव तथाकथित ग्रोथ और फिर शेयर बाजार पर पड़ना लाजिमि है।यही वजह है कि जनवरी के दूसरे सप्ताह में बजट पूर्व वित्त मंत्री के साथ चर्चा में उधोगपत्तियों ने औधोगिक वृद्धि की दुहाई देकर पैकज को कुछ और समय तक जारी रखने का आग्रह किया।
कृषि की दशा जस की तस बनी हुई है।महंगाई भी दिनोदिन बढ़ती ही जा रही है।कृषि मंत्री शरद पवार का बयान कि रबी फसल के बाद ही महंगाई में कुछ कमी आएगी,ने बढंती कीमतों को और हवा दे दी।कृषि क्षेत्र के लिए ठोस कदम उठाने होगे।कृषि विशेषज्ञ देविन्दर शर्मा के अनुसार आज जरूरत किसानों को कर्ज देने की नहीं बल्कि उनकी आमदनी बढ़ाने की है।
सरकार को इसपर अमल करना चाहिए। तभी अवारा पैसों(संस्थागत विदेशी निवेश) की जगह स्वस्थ महौल में उपर चढ़ा सेंसेक्स,निफ्टी एक सीमा तक स्थायी होगा।साथ ही अधिक लोगों तक अपनी पहुंच बनाने में कामयाब होगी।
सेंसेक्स के 21 हजार तक या उसके पार जाने की संभावना तो दिखती है परन्तु वर्तमान महौल में कब तक उस स्तर पर बना रहेगा।यह तो आने वाले समय में ही पत्ता चल पाएग। फिर भी 2009 की तुलना में यह साल बहतर ही रहने की संभावना है।

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